कितनी बार की
कयि से की
कयी बार की
टूट के की
जितनी बार की
खामोशी से की
लफ़्ज़ों से की
नज़ाकत से की
तवज़्ज़ो से की
नफ़ासत सी की
इबादत से की
ख्वाबों मे की
मयखानों मे की
टूटे अरमानों के शमशनों मे की
नफ़रत हो गयी अबकी
जब एक से ही
मोहब्बत इतनी बार की
Collection of my few writing attempts, I use to write here what I feel around me.
सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों उलझने हों या अफ़साने हों खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...
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