एक याद थी अधूरी सी एक छोटी सी रात की उसमे आवाज़ें गूँजती थी एक अनकही सी बात की रास्तों के शोर मे शहर की भोर मे वो याद ढलती गयी समस्यायों के निदान मे भविष्य के संज्ञान मे सबके पीछे वो चलती गयी सही के उल्लास मे ग़लत के शोक मे तिल तिल करके वो जलती गयी थी गल्ति या नही सोच के वो ग़लती गयी अदखिले से फूल देख के गुनगुनी धूप सेंक के मगर लौट वो आती थी चेहरे पे देख लट लटकती जब पन्नों पे ये उंगलियाँ भटकती हर मर्तबा वो लौट आती थी बन के भीगी सी आँख सी बन के भारी सी साँस सी वो जो एक याद थी अधूरी सी एक छोटी सी रात की उसमे आवाज़ें गूँजती थी एक अनकही सी बात की
Collection of my few writing attempts, I use to write here what I feel around me.
Wednesday, January 17, 2018
एक याद थी अधूरी सी...
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वादा है की
सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों उलझने हों या अफ़साने हों खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...
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मेरे दिल में बसा कोई ख्वाब हँसा तो लगा की ये दिन ख़ास है मुस्कुरा के सुबह जो यूँ धरती पे आई जैसे सुहानी सी सौगात है जब जमीं पे पड़ी वो पानी ...
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सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों उलझने हों या अफ़साने हों खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...
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गुजर जाओ यहा से तो कभी लौट के भी आना है तुम्हारे पीछे चला आ रहा हूँ यह बताने के लिए और तुम हो की डर से सिमाटते जा रहे हो खुद को मुझ...
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