Wednesday, January 17, 2018

एक याद थी अधूरी सी...

एक याद थी अधूरी सी
एक छोटी सी रात की 
उसमे आवाज़ें गूँजती थी 
एक अनकही सी बात की 
रास्तों के शोर मे 
शहर की भोर मे 
वो याद ढलती गयी 
समस्यायों के निदान मे 
भविष्य के संज्ञान मे 
सबके पीछे वो चलती गयी
 सही के उल्लास मे
ग़लत के शोक मे 
तिल तिल करके वो जलती गयी 
थी गल्ति या नही 
सोच के वो ग़लती गयी
अदखिले से फूल देख के
गुनगुनी धूप सेंक के   
मगर लौट वो आती थी 
चेहरे पे देख लट लटकती
जब पन्नों पे ये उंगलियाँ भटकती 
हर मर्तबा वो लौट आती थी 
बन के भीगी सी आँख सी 
बन के भारी सी साँस सी
वो जो एक याद थी अधूरी सी
एक छोटी सी रात की 
उसमे आवाज़ें गूँजती थी 
एक अनकही सी बात की

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वादा है की

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