चला हूँ जिस पथ पे अब तो
पाउँगा मंजिल इसी रास्ते से
भले ही कुछ देर हो जाये
कर्त्तव्य मेरा सिपाही सा
बेहतर है पीछे लौटने से
रण में ही ढेर हो जाये
शाम हो गयी तो क्या
उजालों की तलाश अब
और एक बेर हो जाये
धुंधली दिख रही है तस्वीरें
फिर भी देखूंगा सूरज
ठहरो जरा सबेर हो जाये
** बेर = उत्तर प्रदेश की कड़ी बोली में बेर का तात्पर्य होता है एक बार i.e. once
कॉपीराइट रमन शुक्ला :)
Collection of my few writing attempts, I use to write here what I feel around me.
Tuesday, April 20, 2010
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वादा है की
सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों उलझने हों या अफ़साने हों खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...
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मेरे दिल में बसा कोई ख्वाब हँसा तो लगा की ये दिन ख़ास है मुस्कुरा के सुबह जो यूँ धरती पे आई जैसे सुहानी सी सौगात है जब जमीं पे पड़ी वो पानी ...
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गुजर जाओ यहा से तो कभी लौट के भी आना है तुम्हारे पीछे चला आ रहा हूँ यह बताने के लिए और तुम हो की डर से सिमाटते जा रहे हो खुद को मुझ...
1 comment:
AAha...maja aa gaya aapki panktiyaan padkar :)
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