Sunday, September 12, 2010

दो लाइने

तनहा ठहरा हूँ सहरा में वरना अभी डूब जाने को गम बहुत हैं
मिला था जो दिल वो तोड़ आया हूँ , वरना दिल चुराने को सनम बहुत हैं

वैसे तो लरजते लफ़्ज़ों से शायरी कर रहा होता अभी तो बताने को गम बहुत हैं
मुफलिसी में उनको याद करता हूँ वरना करने को इस दुनिया में करम बहुत हैं

कॉपीराइट रमन शुक्ला :)

वादा है की

  सुर्खियाँ हो या झुर्रियाँ हों     नज़दीकियाँ या फिर दूरियाँ हों   उलझने हों या अफ़साने हों   खफा हों तुमसे या तुम्हारे ...