कल रात एक खिड़की खुली छूट गयी
चाँद की रोशनी, कुछ फूलों की खुश्बू और
कुछ नीरव आवाज़े अपने साथ ले आई तुम्हारी यादें
वो शुन्य को निहारती तुम्हारी आँखे
बायें गाल पे झूमती वो जुल्फें
वो यादें जिनमे तुम्हारा
दिखाना की नही देख रही हो तुम
इतना ही नही वो यादें लाई थी वो पल
जिनमे तुम दिनो मे मानी जबकि
पलों मे रूठ गयी थी
इनके साथ गुजर गयी रात मेरी क्यूंकी
कल रात एक खिड़की खुली छूट गयी थी
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